OTT पर सुरक्षा उपायों और नशे के खिलाफ देशव्यापी प्रयास की जरूरत: विजयादशमी पर मोहन भागवत

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नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सरकार से OTT प्लेटफॉर्म को लेकर सुरक्षा उपायों पर विचार करने की अपील की और नशे के खिलाफ देशव्यापी सामाजिक प्रयास का आह्वान किया। विजयादशमी संबोधन में उन्होंने युवाओं के विवेक, सामाजिक एकजुटता और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग को प्रमुखता दी।

संघ के शताब्दी कार्यक्रमों के समापन पर 20 अक्टूबर को नागपुर में भागवत ने कहा कि सूचना तक खुली पहुंच के साथ सही और हानिकारक प्रभावों के बीच अंतर करने की समझ भी जरूरी है। उनके वक्तव्य कार्रवाई और व्यवहार में बदलाव की अपील थे, नए सरकारी नियमों की घोषणा नहीं।

OTT, डिजिटल विवेक और नशे की चुनौती

भागवत ने कहा कि कई देशों ने सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों के अनुभव के बाद अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए हैं। भारत में भी विशेष रूप से OTT प्लेटफॉर्म के संदर्भ में ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है और शासन-प्रशासन को इस पर विचार करना चाहिए।

उन्होंने अभिभावकों और बड़ों की जिम्मेदारी बताई कि वे नई पीढ़ी को उचित-अनुचित का विवेक सिखाएं। नशे को गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताते हुए उन्होंने सरकार, प्रशासन और समाज से समय रहते प्रयास शुरू करने को कहा।

भागवत ने कहा कि स्वयंसेवक इस समस्या पर काम करने वालों को साथ लाकर देशव्यापी प्रतिरोध खड़ा करने का प्रयास करेंगे। संबोधन में इस प्रयास की शुरुआत की तारीख, वित्तीय व्यवस्था या कार्यान्वयन की समय-सारणी नहीं बताई गई।

विज्ञान का स्वागत, उपयोग में नैतिक अनुशासन

भागवत ने विज्ञान और तकनीक की प्रगति का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे भौतिक सुविधाएं बढ़ सकती हैं और ज्ञान तथा तर्क के आधार पर व्यवहार बेहतर हो सकता है। लेकिन तकनीक एक साधन है और उसका परिणाम मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है।

उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए भ्रम और ठगी तथा वैज्ञानिक ज्ञान से स्वच्छ ऊर्जा के साथ विनाशकारी हथियार बनने की संभावनाओं का उल्लेख किया। उनका जोर तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक और व्यावहारिक अनुशासन पर था।

नेपाल की त्रासदी का संदर्भ देते हुए उन्होंने हिमालय क्षेत्र में नुकसान को एकांगी विकास से जोड़ा। आपदा के कारणों पर यह उनका आकलन था। उन्होंने विकास और पर्यावरण को साथ लेकर चलने वाला संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की अपील की।

आंदोलन समाधान के लिए हों, संवैधानिक मर्यादा बनी रहे

भागवत ने माना कि बड़े समाज में समस्याएं और व्यवस्था में अनेक कमियां होती हैं। इनके कारण आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका उद्देश्य समाधान होना चाहिए।

उन्होंने संयम की यह अपील आंदोलन करने वालों, राजनीतिक नेताओं तथा शांति और व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारियों, सभी के लिए की। उन्होंने कहा कि भावनाएं तीव्र होने पर भी कदम संविधान और कानून की मर्यादा में रहें तथा उनसे घृणा, कटुता या विभाजन पैदा न हो।

उन्होंने नीतियां और अभियान लागू करने वालों से नागरिकों के सम्मान का ध्यान रखने तथा भद्र व्यवहार करने को भी कहा। पुराने ऐतिहासिक संदेह सुलझाने के प्रयास में नई गांठें न पड़ें और छोटी बातों पर उकसावे से बचा जाए, यह उनका आग्रह था।

एक अलग राजनीतिक टिप्पणी में उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को कमजोर करने वाली ताकतें मतभेदों का लाभ उठाती हैं और कुछ महत्वाकांक्षी नेता उनकी सहायता करते हैं। उस हिस्से में उन्होंने किसी विशेष संगठन या व्यक्ति का नाम नहीं लिया। उन्होंने राजनीतिक लाभ को सद्भाव पर हावी न होने देने की चेतावनी दी।

पंच परिवर्तन को दैनिक जीवन में उतारने पर जोर

भागवत ने पंच परिवर्तन को केवल शताब्दी वर्ष का कार्यक्रम नहीं, व्यवहार बदलने की निरंतर प्रक्रिया बताया। इसके पांच विषय हैं सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण, स्वबोध और स्वदेशी तथा नागरिक अनुशासन।

उन्होंने कहा कि छोटे रचनात्मक कार्यों से आदतें विकसित होनी चाहिए, जो व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में दिखें। उनके अनुसार सामान्य नागरिक भी हर समस्या के सरकारी समाधान या आंदोलन का इंतजार किए बिना देशसेवा में योगदान दे सकते हैं।

सामुदायिक भागीदारी के उदाहरण के तौर पर उन्होंने 21 संगठनात्मक प्रांतों के 210 जिलों में लगभग 1,296 ग्रामीण विद्यालयों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि ग्रामवासियों और स्वयंसेवकों के साथ काम करने वाले विद्यालयों में उपस्थिति, सीखने के स्तर और अभिभावकों की भागीदारी में सुधार हुआ। समाज ने बुनियादी सुविधाओं, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सहयोग दिया।

विविधता, एकता और वन्दे मातरम्

भागवत ने कहा कि भारत के विभिन्न पंथों, भाषाओं, प्रांतों, जातियों और जीवन पद्धतियों के बीच एकता का आधार उन विविधताओं का स्वीकार और सम्मान होना चाहिए। उन्होंने भारतवासियों के आपसी और देश के साथ संबंध को बिना शर्त बताया।

उन्होंने संगठित हिन्दू समाज के लिए संघ के कार्य को सभी पंथों के सम्मान और राष्ट्रीय एकता के अनुकूल बताया। उनके वर्णन में हिन्दू दृष्टि के लक्षण आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व हैं; कोई अनिवार्य पूजा पद्धति, खानपान, भाषा या राजनीतिक विचारधारा नहीं।

बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने वन्दे मातरम् को पूरा, स्वाभिमान के साथ और बिना संकोच या विरोध के गाने का आह्वान किया। देशभक्ति, समान पूर्वजों के प्रति गौरव और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को उन्होंने ऐसी एकता का आधार बताया जो अलग-अलग पहचानों के साथ रह सकती है।

शताब्दी संपर्क और आगे की दिशा

संघ के संपर्क अभियान के आंकड़े देते हुए भागवत ने कहा कि 4,61,527 गांवों और 41,076 नगरीय बस्तियों के 10,19,88,511 घरों तक संपर्क किया गया। उन्होंने युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवाओं की भागीदारी भी बताई। ये संगठन की ओर से बताए गए आंकड़े हैं।

संबोधन की शुरुआत में उन्होंने संत रविदास, स्वामी श्रद्धानंद, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और राज नारायण बसु का स्मरण करते हुए सेवा, सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक आत्मबोध से उनकी विरासत को जोड़ा।

शताब्दी कार्यक्रमों के बाद संघ के काम की दिशा बताते हुए उन्होंने संगठित और समर्थ समाज बनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि राष्ट्रीय प्रगति और विश्व के लिए सकारात्मक भूमिका निरंतर व्यक्तिगत पुरुषार्थ से आएगी; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है।

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