नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बजट 2026 में विदेश में पढ़ाई की योजना बना रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवारों को लक्षित राहत दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की कि लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत शिक्षा और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए ₹10 लाख से अधिक की रेमिटेंस पर टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) की दर 5 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दी गई है।
हालांकि TCS को अंतिम आयकर देयता में समायोजित किया जा सकता है, लेकिन ऊंची दर के कारण परिवारों को पहले चरण में बड़ी राशि अटकानी पड़ती थी, जिसकी रिफंड प्रक्रिया में महीनों लग जाते थे। नई दर से नकदी प्रवाह (लिक्विडिटी) में सुधार की उम्मीद है, खासकर ऐसे समय में जब विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस, रहने का खर्च और फंड-प्रूफ की मांग लगातार बढ़ रही है।
LRS के तहत भारतीय निवासी शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा और निवेश जैसे अनुमत उद्देश्यों के लिए सालाना 2.5 लाख अमेरिकी डॉलर तक विदेश भेज सकते हैं। अब तक ₹10 लाख से ऊपर की शिक्षा रेमिटेंस पर 5 प्रतिशत TCS लगता था, जिसे कई परिवार प्रवेश सत्र के दौरान भारी बोझ मानते थे। संशोधित दर स्व-वित्तपोषित रेमिटेंस और शिक्षा ऋण से समर्थित दोनों मामलों पर लागू होगी, जिससे पहले बजट में दी गई राहत का दायरा और बढ़ गया है।
इस फैसले का समय भी अहम माना जा रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़े 2025 के अंत में शिक्षा से जुड़ी विदेशी रेमिटेंस में नरमी का संकेत देते हैं, जो बढ़ती लागत के प्रति परिवारों की संवेदनशीलता को दर्शाता है। वहीं, शिक्षा ऋण वितरण में वृद्धि यह बताती है कि आर्थिक दबावों के बावजूद विदेशी पढ़ाई की मांग बनी हुई है।

उद्योग जगत ने इस कदम को व्यावहारिक हस्तक्षेप बताया है। VFS Global के संस्थापक और सीईओ ज़ुबिन कारकरिया ने कहा कि बजट वैश्विक मोबिलिटी और दीर्घकालिक मानव पूंजी विकास के पक्ष में स्पष्ट संकेत देता है। उनके अनुसार, LRS के तहत TCS में कटौती से छात्रों और परिवारों पर वित्तीय दबाव कम होगा और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा तक पहुंच आसान बनेगी, जो विज़न 2047 के लक्ष्यों के अनुरूप है।
कारकरिया ने यह भी कहा कि क्षमता निर्माण और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस पर सरकार का व्यापक जोर इन उपायों को मजबूती देता है, जिससे वैश्विक शिक्षा, यात्रा और सेवाओं के इकोसिस्टम में भारत की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
हालांकि नई TCS दर से कुल कर देयता नहीं घटती, लेकिन रेमिटेंस के समय आने वाली सबसे बड़ी बाधा—तात्कालिक नकदी दबाव—काफी हद तक कम हो जाती है। कई मध्यम-आय परिवारों के लिए यह बदलाव योजनाओं को टालने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने के बीच का फर्क साबित हो सकता है।
जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय शिक्षा महंगी होती जा रही है, बजट 2026 का यह कदम समय पर राहत देता है। भले ही यह सुधार क्रमिक हो, लेकिन इससे सरकार की उस मंशा की पुष्टि होती है, जो वैश्विक मोबिलिटी को प्रोत्साहित करने और भारत की अंतरराष्ट्रीय मानव पूंजी को मजबूत करने पर केंद्रित है।

