देशभक्ति बनाम धार्मिक मान्यता? वंदे मातरम् पर नई बहस शुरू

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बेंगलुरु: कर्नाटक की मजलिस-ए-इमारत-ए-शरिया के मौलाना इमरान मकसूद ने सरकार के उस हालिया निर्देश पर आपत्ति जताई है, जिसमें राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् गाने या बजाने को अनिवार्य किया गया है।

मौलाना मकसूद ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रगान और उसकी गरिमा के प्रति उनका पूर्ण सम्मान है। हालांकि, उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के कुछ पद मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते। उनके अनुसार, गीत के कुछ अंश देवी दुर्गा को समर्पित हैं, जो इस्लाम की उस आस्था के विपरीत है जिसमें अल्लाह के अलावा किसी अन्य की उपासना स्वीकार्य नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमारे हिंदू भाई इसे गाएं, हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मुसलमानों के लिए इसे पढ़ना या गाना धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं है।”

मौलाना ने यह भी स्पष्ट किया कि समुदाय को देशभक्ति या राष्ट्रीय प्रतीकों से कोई विरोध नहीं है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए इस निर्देश पर पुनर्विचार किया जाए।

उन्होंने कहा, “हम सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इस आदेश को वापस ले और सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करे।”

यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस को तेज कर रहा है।


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