नई दिल्ली: दिल्ली के शालीमार बाग विधानसभा क्षेत्र के शालीमार गांव में 30 मई तक मकान खाली करने के हाईकोर्ट के आदेश के बाद तनाव का माहौल गहरा गया है। इलाके के लोगों को प्रशासन की ओर से बुलाकर बातचीत की जा रही है, जबकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे मुआवजा, पुनर्वास और अपने दस्तावेजों को लेकर अब भी असमंजस और भारी दबाव में हैं।
जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई आजादपुर सब्जी मंडी से मैक्स अस्पताल तक सड़क चौड़ीकरण परियोजना से जुड़ी है। इसी उद्देश्य से जमीन की जरूरत बताई जा रही है और प्रभावित मकानों को खाली कराने की प्रक्रिया तेज की गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने निवासियों को 30 मई तक मकान खाली करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद कभी भी तोड़फोड़ की कार्रवाई शुरू हो सकती है।
प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को नोटिस देकर बुलाया और बताया कि अदालत के निर्देश के अनुसार एडीएम स्तर पर यह तय किया जा रहा है कि किस सीमा तक मकान हटाए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि वे लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं ताकि प्रक्रिया शांतिपूर्वक पूरी की जा सके।
हालांकि, स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। कई निवासियों का कहना है कि वे 1972 से, कुछ 45 वर्षों से, और कई परिवार दशकों से यहां रह रहे हैं। उनका दावा है कि उनके पास रजिस्ट्री, जीपीए, वसीयत, खतौनी, मृत्यु प्रमाण पत्र, म्यूटेशन और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन उनकी बात को ठीक से रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया।
लोगों का आरोप है कि अदालत के समक्ष सभी दस्तावेज सही रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए और प्रशासन बार-बार केवल अदालत के आदेश का हवाला दे रहा है। कई निवासियों ने यह भी कहा कि अगर यह जमीन अवैध कब्जे की थी, तो वर्षों तक निर्माण कैसे होने दिया गया और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कभी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
सबसे बड़ी चिंता मुआवजे और पुनर्वास को लेकर है। प्रभावित परिवारों ने मांग की है कि अगर उनके मकान लिए जाते हैं तो उन्हें पहले उचित मुआवजा दिया जाए, वह भी सर्किल रेट के आधार पर, और रहने की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। कई लोगों का कहना है कि बिना किसी स्पष्ट पैकेज के घर खाली करना संभव नहीं है।
कई परिवारों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी सामने रखा। कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने कर्ज लेकर मकान बनाया है, कुछ परिवारों में दिव्यांग सदस्य हैं, कुछ में गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोग हैं, और कई महिलाएं कह रही हैं कि उनके पास बच्चों को लेकर जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है, क्योंकि यह इलाका मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के विधानसभा क्षेत्र में आता है। कुछ स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी खुलकर अपनी नाराजगी जताई और कहा कि वे वर्षों से पार्टी से जुड़े रहे, लेकिन अब उनका अपना मकान टूटने की कगार पर है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई महीनों से वे मानसिक दबाव में हैं। लगातार नोटिस, घोषणाएं और बुलावे से परिवारों में भय और अवसाद बढ़ गया है। उनका आरोप है कि प्रशासन उनकी समस्याएं सुनने के बजाय केवल हस्ताक्षर लेने और औपचारिकता पूरी करने में जुटा है।
फिलहाल, प्रशासन और प्रभावित परिवारों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन 30 मई की समयसीमा नजदीक आने के साथ ही इलाके में बेचैनी बढ़ती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या लोगों को समय रहते उचित मुआवजा और पुनर्वास मिलेगा, या फिर तय समयसीमा के बाद बुलडोजर कार्रवाई शुरू होगी।

