बेंगलुरु: प्रस्तावित लोकसभा सीटों के डिलिमिटेशन (विभाजन) को लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय और संघीय ढांचे पर सीधा हमला बताया है।
X पर अपने पोस्ट में सिद्दारमैया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मुद्दे पर बोलने का स्वागत किया, लेकिन इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए इसे चुनावी रणनीति बताया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मुद्दा सीटों की संख्या बढ़ाने का नहीं है, बल्कि यह है कि यह बढ़ोतरी किस तरह से हो रही है और इसका फायदा किसे मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बदलाव के तहत उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 (+40), महाराष्ट्र 48 से 72 (+24), बिहार 40 से 60 (+20), मध्य प्रदेश 29 से 43–44 (+14–15), राजस्थान 25 से 37–38 (+12–13) और गुजरात 26 से 39 (+13) हो सकती हैं।
वहीं दक्षिणी राज्यों को अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी मिलेगी — कर्नाटक 28 से 42 (+14), तमिलनाडु 39 से 58–59 (+20), आंध्र प्रदेश 25 से 37–38 (+12–13), तेलंगाना 17 से 25–26 (+8–9) और केरल 20 से 30 (+10)।
सिद्दारमैया ने कहा कि पांच दक्षिणी राज्यों को कुल मिलाकर केवल 63–66 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, जबकि सात भाजपा शासित राज्यों को लगभग 128–131 सीटों का लाभ मिलेगा, जो लगभग दोगुना है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा की कुल सीटें 816 होने के बावजूद दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी लगभग 24% ही रहेगी, जो पहले से ही सीमित है।
“जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर प्रशासन में आगे रहने वाले राज्यों को दंडित किया जा रहा है,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कर्नाटक की हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तो इस प्रक्रिया से राज्य को क्या लाभ होगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि प्रतिनिधित्व का अंतर और बढ़ जाएगा — उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के बीच अंतर 52 से बढ़कर 78 सीटों तक पहुंच सकता है, जबकि महाराष्ट्र का अंतर 20 से बढ़कर 30 सीट हो जाएगा।
सिद्दारमैया ने इसे “संघवाद पर खुला हमला” बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार सत्ता को केंद्रीकृत करने और दक्षिणी राज्यों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा कि इस तरह का बड़ा संरचनात्मक बदलाव बिना व्यापक चर्चा और राज्यों से परामर्श के नहीं किया जाना चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि कर्नाटक और संघीय ढांचे में विश्वास रखने वाले सभी राज्य इस तरह के किसी भी प्रयास का सख्ती से विरोध करेंगे।

