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मालवीय नगर अग्निकांड ने दिल्ली के लाल डोरा क्षेत्रों, सुरक्षा निगरानी और शहरी प्रशासन पर खड़े किए बड़े सवाल

नई दिल्ली, 3 जून: मालवीय नगर स्थित एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान में हुए भीषण अग्निकांड, जिसमें 21 लोगों की जान चली गई, ने दिल्ली के लाल डोरा क्षेत्रों, भवन सुरक्षा मानकों और शहरी प्रशासनिक निगरानी को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) द्वारा इस घटना की उच्चस्तरीय जांच शुरू किए जाने के बीच अब चर्चा केवल अग्नि सुरक्षा नियमों या भवन स्वीकृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या ब्रिटिश काल की लाल डोरा व्यवस्था आज के आधुनिक दिल्ली महानगर की जरूरतों के अनुरूप है।

घटना के बाद स्थायी समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा ने एमसीडी आयुक्त संजीव खिरवार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ घटनास्थल का दौरा किया। इस दौरान भवन के स्वामित्व, लाइसेंसिंग स्थिति, निर्माण अनुमतियों, अग्नि सुरक्षा प्रावधानों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों की विस्तृत जांच के निर्देश दिए गए।

वहीं दिल्ली के महापौर प्रवेश वाही ने भी निगम आयुक्त को तीन दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि जांच में यह देखा जाएगा कि कहीं भवन उपविधियों, अग्नि सुरक्षा मानकों या अन्य वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन तो नहीं किया गया था।

हालांकि इस त्रासदी ने एक व्यापक प्रश्न भी खड़ा कर दिया है कि क्या दिल्ली के लाल डोरा क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए वर्तमान नियामकीय ढांचा पर्याप्त है।

लाल डोरा व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1908 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी। उस समय गांवों की आबादी (आबादी क्षेत्र) और कृषि भूमि को अलग-अलग दर्शाने के लिए राजस्व मानचित्रों पर लाल रेखा खींची गई थी, जिसे बाद में “लाल डोरा” कहा गया। इन क्षेत्रों को कई पारंपरिक नगर निगम भवन नियमों और विकास नियंत्रणों से छूट प्राप्त थी।

लेकिन पिछले कई दशकों में दिल्ली का विस्तार इतनी तेजी से हुआ कि अनेक लाल डोरा गांव अब घनी आबादी वाले शहरी और व्यावसायिक क्षेत्रों में बदल चुके हैं। जहां पहले केवल आवासीय गतिविधियां होती थीं, वहीं अब होटल, गेस्ट हाउस, रेस्टोरेंट, गोदाम और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं।

शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की बदलती जरूरतों के बीच यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या सभी व्यावसायिक गतिविधियों को समान भवन और अग्नि सुरक्षा मानकों के दायरे में लाया जाना चाहिए, चाहे वे किसी भी श्रेणी की भूमि पर संचालित हो रही हों।

मालवीय नगर की घटना ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या पुराने भूमि वर्गीकरण और आधुनिक शहरी वास्तविकताओं के बीच मौजूद अंतर सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा कर रहे हैं।

एमसीडी आयुक्त संजीव खिरवार की निगरानी में चल रही जांच में भवन की स्वीकृत क्षमता, लाइसेंसिंग दस्तावेज, सुरक्षा व्यवस्थाओं और निरीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की जाएगी। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि राजधानी के अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का भी निरीक्षण किया जा सकता है।

यह त्रासदी विभिन्न एजेंसियों—एमसीडी, दिल्ली सरकार, अग्निशमन विभाग और अन्य नियामक संस्थाओं—के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है, ताकि सुरक्षा संबंधी उल्लंघनों की पहचान समय रहते की जा सके।

हालांकि जांच अभी जारी है और घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा रहा है, लेकिन इस अग्निकांड ने दिल्ली के शहरी नियोजन, भवन सुरक्षा और लाल डोरा व्यवस्था की प्रासंगिकता पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजधानी को भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाना है, तो केवल दोष तय करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि क्या एक सदी पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था आज की महानगरीय चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है या नहीं।

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