नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने मामले की सुनवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के समक्ष उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद अब कमजोर हो गई है।
अपने आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी लगभग 9 मिनट 40 सेकंड के वीडियो में केजरीवाल ने कहा कि यह मामला अब केवल जीत-हार का नहीं बल्कि सही और गलत के बीच चुनाव का है। उन्होंने इसे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताते हुए कहा कि ऐसे समय में यह तय करना होता है कि आसान रास्ता चुना जाए या कठिन लेकिन सही रास्ता।
केजरीवाल ने दोहराया कि उन्हें एक “झूठे केस” में फंसाया गया, कई महीनों तक जेल में रखा गया और उनकी चुनी हुई सरकार को “गलत तरीके से गिराया गया।” उन्होंने कहा कि 27 फरवरी को अदालत ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित किया था और सीबीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे।
हालांकि, उन्होंने बताया कि सीबीआई ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने आया। यहीं से उनके मन में निष्पक्षता को लेकर शंकाएं उत्पन्न हुईं।
उन्होंने अपनी चिंता के दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उन्होंने कहा कि जज साहिबा का संबंध उस विचारधारा से जुड़े मंचों से रहा है, जिसका उनकी पार्टी राजनीतिक रूप से विरोध करती है, जिससे निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
दूसरा, उन्होंने “कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट” का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जज के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं और सीबीआई की ओर से पेश हो रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केस आवंटन में भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, इससे किसी भी व्यक्ति के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या ऐसे हालात में निष्पक्ष फैसला संभव है।
इसके बावजूद केजरीवाल ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और उन्होंने हमेशा उसका सम्मान किया है। उन्होंने याद दिलाया कि इसी न्यायपालिका ने उन्हें जमानत दी और बाद में निर्दोष भी घोषित किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका जज या उनके परिवार से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है, लेकिन न्याय का सिद्धांत यही कहता है कि “न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।”
केजरीवाल ने बताया कि उन्होंने पूरे सम्मान के साथ जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से इस मामले से खुद को अलग करने का अनुरोध किया था, ताकि किसी अन्य जज द्वारा सुनवाई हो सके। हालांकि, जज ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और खुद ही केस सुनने का निर्णय लिया।
इस स्थिति को “अपने केस से बड़ा मुद्दा” बताते हुए केजरीवाल ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया। उन्होंने घोषणा की कि वे इस मामले में न तो स्वयं अदालत में पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील पैरवी करेगा।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते रहेंगे और उचित समय पर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।
केजरीवाल ने कहा कि उनका यह कदम न तो अहंकार, न विरोध और न ही न्यायपालिका के अपमान के लिए है, बल्कि इसका उद्देश्य देश की न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को और मजबूत करना है।
अंत में उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश के नागरिकों का न्याय प्रणाली पर अटूट भरोसा बना रहे और उन्हें यह विश्वास हो कि उन्हें अंततः न्याय जरूर मिलेगा।

